आज की कविता नारीरूप

आज की कविता करे विवेचन
      हैं नारी के रूप अनेक।
इन रूपों की शक्ति प्रबल है
     सभी एक से बढ़कर एक।।
 
कहीं मुखर है कहीं मौन है
     कहीं आक्रमणकारी है।
कहीं-कहीं सहती है बंधन
     यह भारत की नारी है।।
 
चोर उचक्के जहाँ चौधरी
     आवारा स्त्री हो बलवान।
बड़ी पुरानी कहे कहावत
    वहाँ नहीं बचते इन्सान।।
 
जो संयम से चले जगत में
      सौम्य बिताती है जीवन।
उस नारी के पक्ष में खोजें
      तब समाज मिलता निर्जन।।
 
जो मदिरा को पीकर झूमे
      रातें करती हो रंगीन।
समाचार मीडिया जगत भी
      सदा बजाता उसकी बीन।।
 
वही वहाँ सम्मानित नारी
     उसको कुछ भी कहना पाप।
तुम्हें अदालत में झकझोरे
     तुम सह लेना सब चुपचाप।।
 
संयम से जो रहती घर में
     वह तो दकियानूसी है।
उसको नारी कहने में ही
     शब्दों की कंजूसी है।।
 
अरे मीडिया वालो जागो
     माँ-बहनों को याद करो।
बन धन-यौवन के दीवाने
     मत समाज बर्बाद करो।।
 
माना हर नारी नारी है
    और किसी की बेटी है।
किंतु अपावन को पावन से
    ढकना कैसी नीति है ।।
 
कुलटा कोई कुलनारी भी
     भेद युगों से जारी है।
पर कलियुग के अंधेपन में
     नारी तो बस नारी है।।
 
जोड़ रही है घर को नारी
     उसका नहीं कहीं सम्मान।
अगर तोड़ना सीख चुकी है
     तब उसकी ऊँची पहचान।।
 
सभी पुरुष अत्याचारी हैं
    पर हर नारी है मासूम।
ऐसा कहने वाले अपनी
    पीठ स्वयं होंठों से चूम।।
 
बालमित्र परनारी लोभी
     हुआ मीडिया भटक गया।
सब पवित्र रूपों को भूला
     मलिन रूप में अटक गया।।
 
नारी की गौरव गाथा का
     दो उसकी उन्नति का साथ।
किंतु पतन को पतन न मानों
      गंदे करते अपने हाथ ।।
 
*शशिपाल शर्मा ‛बालमित्र’*

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आज की कविता बमफोड़ू

आज की कविता बाँट रही है
     काले धन का लिखित प्रमाण।।
बार-बार बम फोड़ू आजा
     फोड़-फोड़ बम मत खा कान।।
 
ले जा चाहे बिन पैसों के
    या फिर दे जा उतना मोल।
जितने से संतोष तुझे हो
     पर न गगन में विष को घोल।।
 
तेरे पापा ने या माँ ने
     माना नोट कमाए हैं।
बिना किए श्रम ढेरों पाए
     हाथ में तेरे आए हैं।।
 
अब तू उनको आग लगाकर
    जग-भर को बतलाता है।
धूम-धड़ाका आतिशबाज़ी
    दुनिया को दिखलाता है।।
 
सोच मगर यह धूम-धड़ाका
      लेता तेरा नाम नहीं।
दुनिया भर को बतलाने का
      बनता तेरा काम नहीं।।
 
किंतु तेरा नाम लिखा जब
    पत्र तुझे मिल जाएगा।
बड़ी शान से फ्रेम मढ़ाकर
    जगह-जगह दिखला पाएगा।।
 
बालमित्र कुछ बच्चे ऐसे
     जैसा पाकिस्तान पड़ौसी।
पढ़ने लिखने पर धन खरचो
     समझाती न माँ न मौसी।।
 
चोर-चोर मौसेरे भाई
     चीन देश भी वैसा है।
ले भाई हराम की दौलत
    फूँक मुफ़्त का पैसा है।।
 
*शशिपाल शर्मा ‛बालमित्र’*

आज की कविता वनदेवी का आक्रोश

 आज की कविता यौवन के
        वन में वनदेवी रहती है।
    कहीं फूल सौरभ देते हैं
          काँटों को भी सहती है।।
 
पुष्प चयन उसकी अभिलाषा
     किंतु कंटकों का व्यवहार।
अनचाहे आँचल को छूकर
  जमा रहे अपना अधिकार।।
 
फूलों की डालियाँ दूर हैं
     काँटे बिछे हुए पग-पग।
वन्य जीव विचरण करते हैं
     भरा हुआ असुरों से जग।।
 
अनचाही बलवती छुअन भी
        आकर लगने लगती है।
आत्मवंचना सुख में डूबी
     मूर्ख स्वयं को ठगती है।।
 
जहाँ सहमति स्नेह भावना
     वहीं छुअन सुख देती है।
सत्य सभी संबंधों का यह
     शेष मरुस्थल रेती है।।
 
मृगतृष्णा में भाग रहे वे
     समझ रेत को ही पानी।
भले उम्र से बड़े हो चुके
    बुद्धि किंतु है बचकानी ।।
 
सुत के मुख को चूम पिता
    पागल बन तब सुख पाता है।
अगर पुत्र को कष्ट हो रहा
          मूँछें उसे चुभाता है ।।
 
 
वनदेवी आक्रोश तुम्हारा
       नहीं समझते जब काँटे।
इनके मुख का भंजन करने
        सक्षम हैं तेरे  चाँटे ।।
 
सारा वन है साथ तुम्हारे
      साहस प्रकट करो अपना।
काँटों की अभिलाषाएँ तब
     टूटेंगी मिथ्या सपना ।।
 
बालमित्र यह त्वचा हमारी
    पैरों से मस्तक तक छाई।
है सबसे विशाल इंद्रिय यह
     सबको कहाँ समझ में आई।।
 
इसका संयम कठिन अधिक है
    किंतु बहुत आवश्यक है।
इस संयम की दशा देख लो
     नर से नर पशु होने तक है।।
 
*शशिपाल शर्मा ‛बालमित्र’
 
 
 
 
   
 
 

आज की कविता कड़वे बिस्कुट

आज की कविता में व्यापारी

       बाप की गाली देता है।

बच्चों को बिस्कुट दिखलाकर

       बाप को धक्का देता है।।

 

नए नाम के दो बिस्कुट हैं

      खा लो बच्चो ! रे दीवानो।

बिस्कुट पिता नहीं पहचाने

       तुम भी उसे नहीं पहचानो।।

 

भरा नीचता से विज्ञापन

       माँ का भी करता अपमान।

अब तक माँ ही बतलाती थी

       पिता कौन इसकी पहचान।।

 

अब बिस्कुट कंपनी बताती

      मानो वही बन गई माता।

जो बिस्कुट पहचान न पाए

     माता को वह कैसे भाता ।।

 

कैसे बाप हो नहीं जानते

     इस बिस्कुट का यदि तुम नाम।

असली पिता ढूँढ़ना होगा

     छिपा कहीं बैठा गुमनाम।।

 

एक सिपाही और बच्चे के

     साथ पिता का यह सँवाद।

विज्ञापन से चौंकाता है

     नए नियम करता ईजाद।।

 

बालमित्र ऐसा विज्ञापन

      करता मुँह का स्वाद कसैला।

मीठे होंगे कैसे बिस्कुट

      जब संदेश है इतना मैला ।।

 

पूछें अगर नाम बिस्कुट का

    नहीं रहा कविता को याद।

इतने घटिया विज्ञापन से

    हुई सूचना भी बरबाद ।।

    

*-शशिपाल शर्मा ‛बालमित्र’*

 

 

आज की कविता साकार-निराकार

आज की कविता जला रही है
       नवरात्रों में घी का दीपक।
दुर्गा की प्रतिमा के आगे
       जलता रहता बहुत देर तक।।
 
धूप-दीप नन्हीं सी घंटी
       वातावरण बदल देती है।
जगदंबा की मधुर आरती
     तन-मन को अति सुख देती है।।
 
निराकार पावनता पसरी
     प्रतिमा किंतु रही साकार ।
माता की मुस्कान में सिमटी
     निराकारिता हो साकार।।
 
केवल निराकार ही हो तो
     पावनता फिर कहाँ रहे।
बिन सुमनों की सुंदरता के
     मधु सुगंध तब कहाँ रहे।।
 
प्रतिमा को आडंबर कहकर
    छीन रहे हो तुम आधार।
तुम सुगंध तो चाह रहे हो
    फूलों को ही रहे नकार।।
 
व्यर्थ परिश्रम है माली का
    क्यों सींचा उसने उपवन।
निराकार सौरभ पाने को
    क्यों डाला सुमनों में जीवन।।
 
बैठ हंस पर कर में वीणा
     लेकर समझा रही शारदा।
नहीं दिव्यता देती दर्शन
     निराकार का ओढ़े परदा।।
 
निराकार वाणी है अपनी
     पर अक्षर दिखते साकार।
यह रहस्य जब समझ सकोगे
     सत्य तभी होगा साकार।।
 
बालमित्र बच्चों के फुग्गे
     रंग-बिरंगे समझाते हैं।
नहीं दीखती हवा मगर हम
    उसे बाँध शोभा पाते हैं।।
 
निराकार की नीरसता भी
     टूट गई आकारों में।
बार-बार आकार बुलाते
     धरती चाँद सितारों में।।
 
 
*-शशिपाल शर्मा ‛बालमित्र’*
 
 
 

आज की कविता पालक-साग

आज की कविता ने पकाया
      साग सलोना पालक का।
कहा पुत्र से खाना खा लो
     अनमन मन था  बालक का।।
 
माँ क्यों साग पकाया तुमने
      हरी घास सा लगता है।
पिज़ा-पास्ता भले खिलाओ
      वह सब खाना जँचता है।।
 
कविता बोली इस पालक में
      बहुत विटामिन रहते हैं।
सेहत बन जाती खाने से
      चश्मे से भी बचते हैं ।।
 
माँ की बात एक कान में
       गई अन्य से निकल गई।
इसके लिए पिज़ा ही लाऊँ
       बालक की माँ समझ गई।।
 
रोटी-पालक धरे रह गए
     कविता लेने चली पिज़ा।
बेटे को समझा न पाई
     मन था उसका बुझा-बुझा।।
 
रहा अकेला घर में बालक
     भूख लगी उसको भारी।
चार रोटियाँ खा लीं उसने
     पालक भी खा ली सारी।।
 
स्वाद अनोखा पाया उसने
     कहाँ पिज़ा इसके आगे।
कूड़ा भोजन सेहत नाशक
     ये विचार मन में जागे।।
 
उस दिन से सुधरा वह बालक
         सेहत का भोजन खाता।
आँखों की छूटी कमज़ोरी
         मोटापा भी रहा जाता।।
 
बालमित्र मित्र भोजन वह होता
        जो तन में न करे विकार।
केवल जो मुख को ही सुख दे
        ऐसा भोजन है बेकार ।।
 
भूख बढ़ाओ पहले अपनी
     फिर खाओ फल शाक अनेक।
जंक-फ़ूड का अर्थ है कूड़ा
          याद रहे सच्चाई एक।।
 
 
*-शशिपाल शर्मा ‛बालमित्र’*
 
 
 

आज की कविता बालों की कालिमा

आज की कविता के सामने
     सजी-धजी दुनिया के रंग।
कहीं असल है कहीं नकल है
     जिन्हें देखकर है वह दंग।।
 
हरे रंग की सजी क्यारियाँ
     फूलों से हैं महक रहीं।
रंग-बिरंगे फूल देखकर
     चिड़ियाँ भी हैं चहक रहीं।।
 
सहसा चिड़ियाँ शान्त हो गईं
           आ पहुँचा बूढ़ा माली।
हुआ पोपला है मुँह उसका
           सिर पर पर झालर काली।।
 
गंजे सिर के दाएँ-बाएँ
        पीछे बाल हो गए काले।
चमक रहे काले बैंगन से
        कल तक थे जो उजले-उजले।।
 
चौंकी-चिड़ियाँ सोच रही थीं
       लगता है देखा-भाला।
अरे यही माली उपवन का
      आज हुआ है कुछ काला।।
 
गिनती भर के दाँत हैं इसके
      वव्व-वव्व कर कुछ कहता है।
रंग बदलकर बुढ़ऊ अपना
     नया अजूबा ही लगता है।।
 
थोड़ी देर चकित थीं चिड़ियाँ
     खी-खी कर फिर सब हँस दीं।
सजे-धजे उपवन में गूँजी
     चहक सुरीली फिर भर दी।।
 
बालमित्र सुन माली दादा
     कुदरत से कैसा खिलवाड़।
अरे ! बुढ़ापा आता सब पर
     टूटा तुम पर नहीं पहाड़।।
 
तुम वसंत भी देख चुके हो
    पतझड़ में भी मौज मनाओ।
पर यूँ रंग लगाकर नकली
    मत कुदरत की हँसी उड़ाओ।।
 
 
 
*-शशिपाल शर्मा ‛बालमित्र’*